Sunday, October 2, 2022
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शहीद Shaheed सपूतों के किस्से, 23 March

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प्रिय पाठक, आप सभी को शहीद Shaheed दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

मित्रों, भारतवर्ष त्याग, बलिदान, शहादत की भूमि रही है। इसका प्रत्येक कण कई कहानियाँ संजोए हुए है। इन्ही अनेको कहानियों में से सबसे महत्वपूर्ण कहानी है सरदार भगत सिंह की। 23 मार्च 1931 को सरदार भगत सिंह, सुखदेव, और राजगुरु को फांसी दी गई। इस दिन को हम शहीद दिवस के रूप में मानते है। आइये जानते है क्या है पूरी कहानी।

भगत सिंह का जन्म व बचपन

बात है सन 1907 की जब बंगा ( वर्तमान पाकिस्तान ) में 28 सितम्बर को एक नन्हे बालक ने जन्म लिया, जिसका नाम भगत सिंह रखा गया। यह बालक बचपन से ही अत्यंत भुद्धिमान, तेज तरार व प्रतिभाशाली था। भगत सिंह अपने बालपन से ही आज़ाद भारत का सपना अपनी आंखों में संजोए हुए थे। वह भारत को अंग्रेजो से छुड़ाना चाहते थे। धीरे धीरे वे बड़े होते गए। जब वह साल के हुए तब कुछ ऐसा हुआ जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। वह घटना थी जलियांवाला बाग़ हत्याकांड।

जलियांवाला बाग़ हत्याकांड

जलियांवाला बाग हत्याकांड के बारे में भगत के कानो में जब भनक लगी तो वह महज १२ साल के थे। उन्होंने तय किया कि वे बाग़ जायेंगे। वह पैदल ४० किलोमीटर दूर बाग़ पहुंचे और जो दृश्य उनको नज़र आया उसने देशप्रेम की भावना को और भड़का दिया। वहाँ की मिट्टी को माथे से लगा कर यह कसम खायी कि जब तक भारत को स्वतंत्र न देख लू चैन से नहीं रहूँगा।

साइमन कमीशन का विरोध

साइमन कमीशन के विरुद्ध प्रदर्शन के दौरान लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गयी। लाला जी की मृत्यु से सारा भारत उत्तेजित हो गया। चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, तथा अन्य क्रन्तिकारी अपने प्रिय नेता लाला जी के मौत का बदला लेने का निर्णय किया। 17 दिसंबर 1928 को ब्रिटिश अफसर सांडर्स को गोली से उड़ा दिया और वहाँ से भाग गए।

संसद में बम फेंकना

मजदूर विरोधी कानून बनने वाले थे, जिसके लिए सभी ब्रिटिश नेता सांसद में उपस्थित हुए थे। इन्ही में सरदार भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त भी कोट पैंट पहन कर शामिल हो गए। जैसे ही स्पीकर ने इन नीतियों के बारे में बोलना शुरू किया भगत सिंह ने असेंबली हॉल में बम फेंक दिया, बटुकेश्वर दत्त ने भी बम फेंका। असेंबली हॉल में अफडा तफडी मच गयी। दोनों ने बहुत सारे पर्चे भी फेंके। ब्रिटिश सेना ने दोनों को बंदी बना लिया।

किताबों से बड़ा कोई मित्र नहीं

जब भगत सिंह को सजा हो गयी थी तब भी वह किताबो से घिरे होते थे। उन्हें क्रांतिकारियों की किताबे पढ़ने में बहुत आनद आता था। वे मार्क्स, लेनिन, सावरकर आदि को पढ़ा करते थे। उन्होंने जेल में लेख लिखना भी शुरू कर दिया। वे अपने लेख के माध्यम से जनता को जागरूक करते थे। अपने फांसी के कुछ समय पहले तक वह रहे थे।

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23 मार्च 1931

सुखदेव, राजगुरु के साथ भगत सिंह तीनो को 24 मार्च को फांसी देनी थी। पुरे भारत में इसकी चर्चा थी। लोग आक्रोशित थे। ब्रिटिश शासन डरा हुआ था कि कंही इस दिन कोई दंगा, विरोध या तोड़फोड़ न हो। इन सब के डर के कारण ब्रिटिश शासन ने तीनो को एक दिन पहले यानि 23 मार्च को फांसी देने का फैसला किया। 23 मार्च के शाम को तीनो को फांसी के लिए तैयार किया गया। वे मरने वाले थे फिर भी उनकी आँखों में कोई डर नहीं था। भारत माता के नारे लगाए जा रहे थे।

उन्होंने फांसी के फंदे को इस दीवानगी से चूमा जैसे कोई अपनी महबूब के मेहँदी वाले हांथो को चूमता है। फिर उन्हें फांसी चढ़ाई गयी। इस तरह भारत के वीर सपूतों के इस बलिदान दिवस को सारा देश शहीद दिवस के रूप में मनाता है।

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Aman Agrawal
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