Tuesday, October 4, 2022
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Chhattisgarh : मां बम्लेश्वरी का धाम डोंगरगढ़

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Chhattisgarh : डोंगरगढ़

Chhattisgarh की माटी खुद में प्रदेश की सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक, प्राकृतिक सपदाओं को समेटे हुए है। यहां की लोक-कला, जंगल, नदियां, संस्कृति, ऐतिहासिक विरासत बेजोड़ है। बेमिसाल बस्तर से शानदार सरगुजा तक छत्तीसगढ़ में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं जो एक पर्यटक के तौर पर आप देखना चाहते हैं।

हमारी पेशकश के जरिए हम आपको छत्तीसगढ़ के ऐसे ही जगहों से आपको रू-ब-रू करा रहे हैं। आज हम आपको दे रहे है छत्तीसगढ़ की सबसे ऊंची चोटी पर विराजमान डोंगरगढ़ की मां बम्लेश्वरी धाम की जानकारी।

2200 साल पुराना है इतिहास

ऐसी मान्यता है कि 2200 साल पहले डोंगरगढ जिसका प्राचीन नाम कामाख्या नगरी था, यहा राजा वीरसेन का शासन था, राजा निःसंतान थे। संतान की कामना के लिए राजा ने महिष्मती पुरी स्थित शिवजी और भगवती दुर्गा की उपासना की जिसके फलस्वरूप रानी को एक वर्ष पश्चात पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। राजा वीरसेन ने कामाख्या नगरी में माँ बम्लेश्वरी का मंदिर बनवाया।

डोंगरगढ़ के इतिहास में कामकदला और माधवानल की प्रेम कहानी बेहद लोकप्रिय है। इससे जुड़े हालात ऐसे बने कि उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने कामाख्या नगरी पर आक्रमण कर दिया। जीतने के बाद राजा विक्रमादित्य ने मां बम्लेश्वरी देवी की आराधना की, देवी प्रकट हुई और विक्रमादित्य ने माधवानल, कामकन्दला के जीवन के साथ ये वरदान भी मांगा कि मां बगुलामुखी अपने जागृत रूप में पहाड़ी में प्रतिष्ठित हो।

मां बम्लेश्वरी के दो मंदिर विश्व प्रसिद्ध

एतिहासिक और धार्मिक नगरी डोंगरगढ़ में मां बम्लेश्वरी के दो मंदिर विश्व प्रसिद्ध है। एक मंदिर 16 सौ फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है जो बड़ी बम्लेश्वरी के नाम से प्रसिद्ध है। वही नीचे स्थित मंदिर छोटी बम्लेश्वरी के नाम से विख्यात है।

ऊपर पहाड़ी पर मुख्य मंदिर स्थित है, जहां पहुंचने के लिए करीब 11सो सीढ़ियां बनी है, वहीं भक्तों की सुविधा के लिए रोप-वे भी है। यात्रियों की सुविधा के लिए रोपवे का निर्माण किया गया है। रोपवे सोमवार से शनिवार तक सुबह आठ से दोपहर दो और फिर अपरान्ह तीन से शाम पौने सात तक चालू रहता है।

1964 में हुई ट्रस्ट की स्थापना

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ में पहाड़ी पर विराजित हैं मां बम्लेश्वरी। 11 सौ सीढ़ियां चढ़ने के बाद होते हैं मां के दर्शन। करीब 22 सौ साल प्राचीन कलचुरी काल में बने इस मंदिर में नवरात्र के दौरान लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं।

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कामाख्या नगरी के नाम से भी प्रसिद्ध है मां बम्लेश्वरी का धाम। डोंगरगढ़ स्थित मां बम्लेश्वरी धाम में माता का मंदिर करीब 16 सौ फीट की ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। 1964 में खैरागढ़ रियासत के भूतपूर्व नरेश राजा वीरेन्द्र बहादुर सिंह ने एक ट्रस्ट की स्थापना कर मंदिर का संचालन ट्रस्ट को सौंप दिया था।

प्रज्ञागिरी – दर्शनीय बौद्ध तीर्थ

डोंगरगढ़ शक्तिपीठ के साथ ही प्राकृतिक रूप से कई पर्यटन स्थलों को समेटे हुए है। इन्हीं में से एक है प्रज्ञागिरी पर्वत। इस पर्वत पर भगवान गौतम बुद्ध की 30 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित है। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के मध्य एक दर्शनीय बौद्ध तीर्थ के रूप में स्थापित प्रज्ञागिरि दोनों राज्यों के मध्य बौद्ध धर्म की समरसता का प्रतीक है।

सघन वनों से आच्छादित छोटी-छोटी डोंगरी से घिरे हुए गढ़-डोंगरगढ़ की पर्वतीय श्रृंखला में कई डोंगर यानि पहाड़िया हो इन्ही में माँ बम्लेश्वरी की पहाड़ी के उत्तर-पूर्व दिशा में नगारा डोंगरी है। इस पर्वत पर भगवान गौतम बुद्ध की ध्यानस्थ मुद्रा में प्रतिमा स्थापित की गई है. इस पर्वत का नाम प्रज्ञागिरि रखा गया था।

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Aman Agrawal
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